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ग्रेटर नोएडा श्रमिक आंदोलन: DU छात्रा पर लगा NSA रद्द, DM लगाया 5 लाख का जुर्माना

  प्रयागराज । डेस्क: कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन और पुख्ता सबूतों के अभाव पर कड़ा रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता ...

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प्रयागराज । डेस्क: कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन और पुख्ता सबूतों के अभाव पर कड़ा रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता और दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी के खिलाफ लगाई गई राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) की कार्रवाई को निरस्त कर दिया है. अदालत ने इसे अवैध निरुद्धि मानते हुए याची को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुआवजे की यह राशि गौतमबुद्ध नगर की तत्कालीन जिलाधिकारी (DM) से वसूल की जाएगी.


न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने आकृति चौधरी द्वारा दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण करते हुए यह निर्णय सुनाया. सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार से सवाल किया था कि क्या निरुद्धि की कार्रवाई से पहले याची को शांतिभंग की आशंका का कोई पूर्व नोटिस दिया गया था? साथ ही, पुलिस से कथित भड़काऊ वीडियो और व्हाट्सएप चैट से जुड़े साक्ष्य भी मांगे गए थे. बुधवार को उपलब्ध कराई गई सामग्री के परीक्षण के बाद पीठ ने पाया कि एनएसए जैसी सख्त कार्रवाई के लिए पुलिस के पास कोई ठोस आधार मौजूद नहीं था.


यह पूरा मामला नोएडा और ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में हुए एक श्रमिक आंदोलन से जुड़ा हुआ है. पुलिस ने आरोप लगाया था कि 13 अप्रैल को प्रदर्शन के दौरान आकृति चौधरी ने मजदूरों को उकसाया, जिसके बाद इलाके में हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न हुआ. इसके बाद उनके खिलाफ कई आपराधिक प्राथमिकियां दर्ज कर एनएसए के तहत कार्रवाई की गई थी. 


दूसरी ओर, याची के वकीलों-सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस और अधिवक्ता चार्ली प्रकाश-ने अदालत में तर्क दिया कि बिना किसी आपराधिक साक्ष्य के छात्रा को इस मामले में झूठा फंसाया गया है, जिसे स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने निरुद्धि आदेश को रद्द कर दिया.


नोएडा और ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में अप्रैल 2024 में एक प्रमुख श्रमिक आंदोलन देखने को मिला था. यह आंदोलन मुख्य रूप से क्षेत्र की विभिन्न फैक्ट्रियों और औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले मजदूरों द्वारा अपनी न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने, काम के तय घंटों का पालन कराने और सुरक्षित कार्यस्थल जैसी बुनियादी मांगों को लेकर शुरू किया गया था. इस प्रदर्शन के दौरान मजदूरों ने एकजुट होकर अपनी मांगों के समर्थन में रैलियां निकालीं और नारेबाजी की.


हालाँकि, 13 अप्रैल 2026 को आंदोलन ने अचानक हिंसक रूप ले लिया. प्रदर्शन के दौरान मजदूरों और स्थानीय पुलिस प्रशासन के बीच झड़प हो गई, जिसके बाद इलाके में पथराव, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं. इस हिंसा से क्षेत्र की सार्वजनिक व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई और कई गाड़ियाँ व संपत्ति क्षतिग्रस्त हो गई. 


पुलिस का आरोप था कि बाहरी सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं ने मजदूरों को भड़काया था, जिसके कारण शांतिपूर्ण प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गया. इस मामले में पुलिस ने कई लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और कई प्रदर्शनकारियों व कार्यकर्ताओं के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की थी.


पुलिस के दावों के अनुसार, नोएडा-ग्रेटर नोएडा में मजदूरों का आंदोलन 10 से 18 अप्रैल 2026 तक चला था और मुख्य रूप से 13 अप्रैल 2026 को वहां हिंसा, पथराव और आगजनी की घटना हुई थी.


हालाँकि, आकृति चौधरी के मामले में 13 अप्रैल की तारीख खुद पुलिस के दावे पर भी सवाल खड़ा करती है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पुलिस ने 13 अप्रैल की हिंसा में आकृति चौधरी को भड़काने का आरोपी बनाया था, जबकि आकृति को पुलिस ने 11-12 अप्रैल 2026 को ही हिरासत में ले लिया था. 


हाईकोर्ट ने इसी विरोधाभास और सबूतों की कमी को देखते हुए राज्य सरकार की थ्योरी को खारिज किया और NSA की कार्रवाई को रद्द कर दिया.

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